पेपर लीक, महंगी शिक्षा और टूटता भरोसा: आखिर युवाओं का आक्रोश कब तक?
सीमित सरकारी अवसर, बढ़ती निजी शिक्षा, कथित पेपर लीक और जवाबदेही की मांग ने देशभर के छात्रों के आंदोलन को नई दिशा दे दी है।
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों का गुस्सा अब केवल एक परीक्षा या एक पेपर लीक तक सीमित नहीं रह गया है। यह वर्षों से जमा होती निराशा, सीमित सरकारी नौकरियों, महंगी निजी शिक्षा, भर्ती में देरी और कथित परीक्षा अनियमितताओं का परिणाम है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच कम-से-कम 89 पेपर लीक के मामले सामने आए। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सार्वजनिक हुए मामलों की संख्या है। हर अनियमितता सामने आए, यह जरूरी नहीं है।
छात्रों का कहना है कि वे वर्षों तक कठिन मेहनत करते हैं, परिवार अपनी बचत पढ़ाई और कोचिंग पर खर्च करता है, लेकिन जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर विश्वास टूट जाता है।
वहीं, उच्च शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, लेकिन सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या अधिक तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
छात्र संगठनों की मांग है कि पेपर लीक मामलों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई या राजनीतिक बयानबाजी से यह असंतोष समाप्त नहीं होगा। युवाओं का विश्वास तभी लौटेगा, जब शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी।
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